आदिमानव और ईश्वर की खोज

जब हम मानव द्वारा संग्रहित ज्ञान और डार्विन के विकासवाद के सापेक्ष मानव के एतिहासिक क्रमविकास को देखते हैं कई बातें उभरती है. किसी अवधारणा के प्रति दुराग्रह मुक्त एक मानव मस्तिष्क ही इन चीजों का आकलन सार्थक रूप से कर पाता है. यह एक निर्विवाद तथ्य है की मानव सभ्यता का विकास प्रकृति के विरुद्ध और उसके द्वारा निर्मित कई प्रकार के डरों के बीच से गुजरते हुए हुआ है, उदहारण के लिए हिंसक पशु, प्राकृतिक आपदाएं, सिमित साधनों का उपभोग करके जीवित रहने के लिए परस्पर प्रतियोगिता ..कई चीजों थी, जिससे मानव जूझता रहा आदिम से आधुनिक बनने के सफ़र में, देखा जाए तो अब भी ये भय चोला बदल-बदल कर अपनी उपस्थिति जताते रहते हैं.

आरम्भ में मनुष्य जब गुफाओं में रहता था आसमान में आलोकित सूर्य से ही उसे उर्जा मिलती. उर्जा के और साधनों की खोज बहुत बाद में हुई. असमान से आते प्रकाश ने उसे यह सोंचने पर विवश किया होगा की ऊपर अवश्य ही कोई है जो उसे दिन में जंगली जानवरों और खूंखार निशाचर जीवों और रात्रि में जानलेवा ठंढ से बचाता है. कहा जा सकता है, इसी भय ने पहले किसी मानसिक संरक्षण और भयमुक्ति प्रदान करने वाली शक्ति की आवश्यकता उत्त्पन की और कालांतर में(भाषा के विकास के साथ)उसे ईश्वर की उपमा से विभूषित किया. इसे हम वर्तमान परिदृश्य में भी देख सकते हैं जहाँ उर्जा के कई प्रतीकात्मक रूपों की आधुनिक समाज में ईश्वर का अंश मान के आराधना की जाती है.

मानव का समाजीकरण प्रकृति की जैविक व्यवस्था के विरुद्ध था. अंतर्विरोधों से संघर्ष करते हुए मनुष्य समाजिकता और सभ्यता की सीढियाँ चढ़ता गया, जटिल होता गया...ईश्वर की अवधारण को कई रूपों में (जैसे चित्रों, गीतों, कहावतों, कहानिओं और लिखित दस्तावेजों द्वारा) अगली पीढी को हस्तान्तरित करता गया..और इसके साथ कई पिढि़ओं से संग्रहित भय (जो उसे अपने बनैले पूर्वजों से विरासत मिला था)भी जटिल होता गया. ईश्वर की अवधारण भी देशकाल समाज के अनुसार बदलती रही...जो आज आपके सामने कई नवीनतम रूपों में उपस्थित है.

आज के लिए इतना ही .. शेष चर्चा फिर कभी. कोई शंका अथवा प्रश्न हो तो अवश्य पूछे.

इसी विषय से संबंधित अन्य प्रविष्टियाँ..
मनुष्य के मष्तिष्क का कार्यात्मक रूप - मन
वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और परा शक्तिओं से सम्बन्ध
स्त्रियों में मनोरोग पराशक्तियाँ और कुछ विचार


अपडेट - अंशुमाली जी की टिप्पणी के बाद मैंने उन्मुक्त जी के पोस्ट का लिंक लगा दिया है, जिसे विकासवाद में रूचि हो वहां पढ़/सुन सकता है.

अन्धविश्वाशी लोगों में पाया जाने वाला सामान्य रोग - स्किजोफ्रेनिया

पिछली पोस्ट में द्विवेदी जी और अनूप जी ने मुझसे स्किजोफ्रेनिया पर हिंदी में लिखने का आग्रह किया था.आज अन्धाविश्वाशों में जुड़े इसके आयामों पर चर्चा होगी.
स्किजोफ्रेनिया से ग्रसित लोग ही सबसे ज्यादा अन्धविश्वाशी होते हैं. ये लोग ही सबसे अधिक ओझाओं,पंडितों,तांत्रिकों और मुल्लों की शरण में जाते हैं. इस रोग से ग्रसित व्यक्ति कल्पनाओं और हकीकत में फर्क करने की क्षमता खो देता हैं.
पहले इसके लक्षणो पर बात करते हैं.

१. सर दर्द अथवा पेट दर्द की शिकायत. जांचने पर कोई कारन अथवा रोग नहीं पाया जाएगा.
२. ये लोग अक्सर अपने पूर्वजों को स्वप्न में देखते हैं.
३. किसी भी अनजान व्यक्ति की चमत्कारिक बातों पर एकदम से भरोषा करते हैं.
४. मृत परिजनों की आवाज सुनना.
५. रोगी बिना कारन के लोगों को शक की दृष्टि से देखने लगता है, दूसरों पर शक करता है की उसने उसपर जादू -टोना कर दिया है. घर पर बिना बताये रोगी तांत्रिकों की शरण में जाता है.
६. अपनी समस्याओं को घर को लोगों से नही बताता.
७. किसी भी कार्य के बीच बुदबुदाता रहता है.
८. लोगों से तुंरत प्रभावित होता है.
९. हर वक्त उदासी घेरे रहती है. हंसने अथवा रोने की स्थिति में असामान्य हो जाते हैं. अगर रोये तब बहुत रोयेंगे, हँसने पर हंसी नही रुकेगी.
१०. खुद को सही समझेंगे और किसी के भी तर्क (अन्धविश्वाश के विरुद्ध ) नही सुनेंगे.
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रोग बढ़ने की दशा में स्थितियां भयंकर हो सकती है. इस विषय में पिछली पोस्ट देखें.
कोई जिज्ञासा अथवा प्रश्न हो तब निसंकोच पूछें. आगे फिर चर्चा की जाएगी.

मनुष्य के मष्तिष्क का कार्यात्मक रूप - मन.

बात पिछली पोस्ट से आगे बढ़ाते हैं. अब हम साइकोसिस रोगों के उस समूह की ओर ध्यान देंगे जो मनुष्य को काल्पनिक छविओं और ध्वनिओं से रूबरू करवाता है, जबकि उसका कोई स्रोत अथवा कारण नही होता. उदहारण के लिए कोई न भी बोल रहा हो तब भी उन्हें आवाजें (कभी - कभी भयानक चीखें भी) सुनाई देती हैं. किसी की भी उपस्थिति न हो तब भी उन्हें काल्पनिक छवियाँ दिखाई देती है. रोग बढ़ने और उपचार न होने की दशा में वे काल्पनिक छविओं और आवाजों के साथ बातचीत भी करने लगते हैं. इस दशा में अगर आपके मन में इश्वर की कृपालु छवि होगी तब वह कृपालु दिखेंगे अन्यथा आपके बुरे कर्मों के लिए आपको श्राप देते हुए. मनुष्य के मष्तिष्क के कार्यात्मक रूप को हम मन की संज्ञा देते हैं. जुंग के अनुसार मनुष्य प्रवृति से धर्मिक होता है, जो मन में ईश्वर है तब वह मनोरोगों में दिखेगा ही.


मनुष्य अपनी चेतना निरंतर हो रहे अनुभवों और स्मृतियों से विकसित करता है. वह अपने समाज और देशकाल में हो रही अथवा हो चुकी घटनाओं से प्रभावित होता रहता है. इन सब के बीच कई बार वह अनिवार्य रूप से समाज द्वारा बनाए गए आदर्श और निकृष्ट व्यक्तित्वों की परिभाषा से अपनी तुलना करता है. यह सब प्रक्रियाएं कहीं परोक्ष रूप से मानव मष्तिष्क में चलती रहती है जिसका भान कुछ को होता है कुछ को नही. मानसिक असंतुलन के समय यह सब चीजें एक साथ सामने आती है. कई बार इनका प्रभाव क्षनिक होता है कई बार बहुत देर तक रहने वाला. यह पुर्णतः इस बात पर निर्भर है की किन कारणों से उस मनुष्य के मानसिक असंतुलन का प्रभाव हुआ है.

इस सन्दर्भ में एक महाशय का उदहारण देना चाहती हूँ. ३५ साल के एक मरीज कुछ दिनों पहले मेरे परिचित मनोचिकित्सक के पास आये उन्हें समस्या थी की उन्हें अनुभव होता था की हर वक्त कोई उनका पीछा कर रहा है उन्हें जान से मार डालेगा. इस कारण उन्होंने अकेले घर से निकालने से इंकार कर दिया. खुद को कमरे में बंद कर बैठे. वे सरकारी सेवक थे. कार्य में निरंतर अनुपस्थिति के कारण उनकी नौकरी खतरे में आ गई गई, तब उनके घर वालों ने उन्हें मनोचिकित्सक के पास ले जाने का फैसला किया.

बातचीत के क्रम में कई बाते सामने आई. उनका बचपन कष्टप्रद बिता था. बचपन में माँ की असामयिक मृत्यु, फिर पिता द्वारा दूसरी शादी, सौतेली माँ द्वारा प्रताड़ना, जैसी कई सारी बाते थी जो उनके मन को निरंतर अवशाद ग्रसित करती गई. उनका जागृत मष्तिष्क इन चीजों को अनदेखा करता गया. पर धीरे धीरे कारणों ने अपना प्रभाव दिखाना आरम्भ किया पहले उन्हें लगाने लगा की सह्कर्मिओं के बीच सारी बाते उनके विरोध में हो रही सब उनकी बुराई कर रहे हैं उन्हें उनके अधिकारी की नजरों में गिरना चाहते हैं. फिर समस्या और विकट हुई. अब उन्हें लगाने लगा सड़क पर चलता हर आदमी उन्हें ध्यान से देख रहा है उनके बारे में बातें कर रहा है. उनके अधिकारी उनकी हत्या करवाने की सोंच रहे हैं, और इन सब की परिणिति उनके द्वारा खुद को कमरे में बंद करके हुई.

चिकित्सा आरम्भ हुई ६ महीने दवा चली. उनका कार्य पर नियमित होना शुरू हुआ और वे सामान्य हो गए इसके बाद उन्होंने दवा बंद कर दी. दवा बंद होने के कई महीनो बाद ये लक्षन फिर प्रकट होने लगे. पर अबकी बार इनका स्वरुप बदला हुआ था उन्हें इस बार ईश्वर दर्शन होने लगे. उनसे बात करने पर उन्होंने बताया की उन्हें ब्रम्हा जी वृद्ध साधू के वेश में आकर प्रवचन देते हैं. जब इनसे मैंने पूछा आप ब्रम्हा से पूछ कर बताइए की उनके मानस पुत्रों की संख्या कितनी है और उनके नाम क्या - क्या है वे बोले मुझे ब्रम्हा ने हिदायत दी है की मैं उनके द्वारा दी गए प्रवचन और ज्ञान को किसी से न बताऊँ. परिजनों ने तंग आकर फिर से चिकित्सा आरम्भ करवाई अब वे स्वस्थ और कार्य में नियमित है पर मनोचिकित्सक को गलियां देते हैं की आपने मुझे ईश्वर दर्शन से वंचित कर दिया है.इन महाशय के केस में स्किजोफ्रेनिया और हैल्यूसिनेशन का प्रभाव रहा.

यह पोस्ट इस लेखमाला की अंतिम पोस्ट है और यह पोस्ट लम्बी भी बहुत हो चुकी है, इसलिए अब अनुमति चाहूंगी. आशा है, ईश्वर दर्शन और मनोरोग में सम्बन्ध आपको भली - भांति समझ आ गया होगा. फिर भी कोई शंका हो तब आपका स्वागत है.
संदर्भित पिछली कडियाँ -
1. वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और परा शक्तिओं से सम्बन्ध.
2. स्त्रियों में मनोरोग और पराशक्तियाँ

वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और परा शक्तिओं से सम्बन्ध

मनुष्य मूलतः एक जैविक यन्त्र है, और मष्तिष्क उस यन्त्र का सबसे जटिल भाग. सिर्फ जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर हम मनुष्य के व्यवहार को परिभाषित नही कर सकते. सामाजिक परिस्थियाँ और परिवेश उसका व्यवहार नियंत्रित करने में अहम् भूमिकाएं निभाते है.

पिछली पोस्ट में हमने मनोरोगों में परा शक्तिओं की उपस्थिति के विभिन्न पहलुओं के बारे में पड़ताल की. अब हम उसके सारे आयामों का अध्ययन एक - एक कर विस्तार से करेंगे.

साइकोसिस संवर्ग के कई वर्तमान रोगियों का व्यवहार भूतकाल में सामान्य होता था (जब तक की स्थितियां उनके मनोनुकूल होती) परन्तु जैसे ही स्थितियां किन्ही कारणों से उनके लिये कष्टप्रद अथवा तनावप्रद हुई, उनके व्यवहार में आश्चर्यजनक बदलाव आने शुरू हुए जो पढ़े-लिखे लोगों में उच्च स्तर की आध्यात्मिकता और अनपढ़ लोगों में परा शक्तिओं से साक्षात्कार में बदल जाता है. इस सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगी मेरी एक परिचित महिला के पुत्र की कुछ साल पहले सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई. वे एक धनी परिवार की संतुष्ट महिला थीं. बच्चे की मृत्यु के पंद्रह दिनों तक वे खुद रोती-बिलखती रहीं. फिर एक सुबह उठी और आश्चर्यजनक रूप से उनका व्यहवार बदल चुका था. उन्होंने बताया की रात को उनके कमरे में प्रकाश फ़ैल गया भगवान जी प्रगट हुए और उन्होंने बताया की तुम्हारा पुत्र जीवित है. सारे लोग जो तुम्हारे आस- पास हैं अज्ञानी हैं.

इस घटना के बाद उन्होंने अपना काल्पनिक संसार बना लिया वे अपने बच्चे के कपडे धोतीं, उसके लिए खाना बनाती, उसके स्कूल फीस जमा करने जाती और किसी के समझाने पर भी यह स्वीकार नही करती कि उनका पुत्र मर चुका है. उनका कहना था की "तुम पर क्यों विश्वास करूँ जब मुझे भगवान ने खुद प्रगट होकर कहा है की तुम सब अज्ञानी हो".

परिजनों को चिंता हुई उन्होंने महिला का इलाज मनोचिकित्सक से करवाने की ठानी. इलाज आरम्भ हुआ. अब स्थितियों में काफी सुधार है पर दवाई रुकते ही देवी जी को भगवान दिखने लगते हैं.

अब इसके कारणों की जाँच की जाये. हमारा मष्तिष्क एक ही समय में कई अनुभवों, संवेदनाओं और स्मृतियों से जूझता रहता है. जो प्रत्यक्ष रूप से कार्य में आने वाले नहीं होते वह उन्हें मूल चेतना से वियोजित करके अवचेतन मष्तिष्क में डाल देता है. मानसिक असंतुलन की स्थिति में यही वियोजन व्यवहार में प्रकट होता है जिसे सामान्य लोग परिभाषित नही कर पाते और अचंभित/चमत्कृत होते हैं.

बाकि आयामों पर चर्चा जारी रहेगी. आलोचनात्मक प्रतिक्रियाओं का स्वागत है.

स्त्रियों में मनोरोग पराशक्तियाँ और कुछ विचार

आपने कभी किसी पर भूत -प्रेत, जिन्न या देवता आते देखा है? अगर आपका जरा भी सरोकार ग्रामीण भारत से रहा हो तब जरुर ऐसे दृश्य आपकी आँखों के सामने से गुजरे होंगे की एक महिला को कुछ लोगों ने थाम रखा है और वह खुद को कोई देवी, पुण्यात्मा अथवा प्रेतात्मा बता रही है, कानाफूसी हो रही है, लोग पराशक्ति के इस चमत्कार पर नतमस्तक हो रहे हैं. उतर - पूर्व भारत में तो पराशक्तियों से छुटकारा पाने के लिए बाकायदा मेले लगाये जाते हैं जिसमे ऐसे दृश्य आम होते हैं. आश्चर्य की बात यह है की ऐसे लोग अधिकतर समाज के उस तबके से आते हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नही होती. अनजानी रोग -व्याधियों के भय के साथ अशिक्षा और अज्ञान की दोहरी मार ही वह कारन है जिसकी परिणिति इन दृश्यों के रूप में होती है.

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो मनुष्य का व्यहवार मस्तिष्क के अन्दर होने वाली जैव रासायनिक प्रक्रिया द्वारा नियंत्रित होता है. मस्तिष्क अगर किसी बाह्य अथवा आंतरिक कारण जैसे मिर्गी, ब्रेन ट्यूमर, तनाव, नशीले पदर्थों का सेवन, अत्यधिक थकान भूख या कमजोरी के कारण उतेजित हो जाए तब मनुष्य को काल्पनिक छवियों, स्पर्स अथवा ध्वनि का साक्षात्कार होने लगता है. इस दशा में यह साक्षात्कार बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है की आपकी सामाजिक संस्कृति -परम्परा में ईश्वर का क्या रूप है. यहाँ ध्यातव्य हो की सभी धर्मो में उपवास को अनिवार्य घोषित किया गया है अतः यह संदेह होना की यह प्रक्रिया धार्मिक पाखंडियों द्वारा समाज को धार्मिक बनाये रखने की दिशा में कुटिल प्रयास है, बहुत अस्वाभाविक नही है.

अब सवाल यह है की स्त्रियाँ ही इन रोगों से अधिक क्यों ग्रसित होती है ?
कारण जानने के लिए हमे अपनी सामाजिक व्यवस्था की जड़ों की तरफ जाना होगा. स्त्रियों की दशा भारतीय ग्रामीण समाज में बहुत दयनीय है. बाल-विवाह, बहु पत्नी प्रथा, कुपोषण और इसके कारण रोगों में वृद्धि, तथा पारिवारिक एवं सामाजिक मामलों में स्त्रिओं की उपेक्षा आदि बहुत से कारण हैं जो स्त्री के अवचेतन मन -मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालते हैं. आज भी ग्रामीण भारत में जब तक स्त्री दैवी शक्तिओं से लैस नही हो जाती भोग्या ही रहती है. देव कृपा से लैस होने के बाद अचानक उसे आदर -सम्मान के भाव से देखा जाने लगता है, उसकी तरफ आँख उठा कर देखने का साहस वे लोग खो देते हैं जो कल तक उसे भोग्या समझते थे, जिसका उसके अवचेतन पर प्रभाव पड़ता है. मैंने एक गैर सरकारी संगठन के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने के अभियान के दौरान कई ऐसे मामलों को देखा. मैंने पाया की धर्म और इश्वर की शक्ति को पीड़ित लोग अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं. मनोचिकित्सकीय परीक्षन के दौरान ऐसी स्त्रियाँ जब अपने मन के कपाट खोलती हैं तो आभावों और अत्याचारों से पीड़ित मन के कंपा देने वाले संस्मरण निकलते हैं.

अब प्रश्न है की वे सारे लोग जिन्होंने परा शक्तियों से साक्षात्कार का दावा किया है क्या मानसिक अथवा साइकोसिस संवर्ग के रोगी हैं ?
हम इसके दुसरे पहलु पर ध्यान केन्द्रित करते हैं. इसका एक आर्थिक पहलू भी है. इश्वर का साक्षात्कार करने वाले बाबाओं और ओझा -गुणिओं की बात करे तब हम पाते हैं इन्होने अपनी बोली-वाणी, रहन -सहन और व्यहवार ऐसा बना लिया है की कोई भी आसानी से इनपर विश्वास कर ले. ये लोग पुर्व निर्धारित योजनाओं के तहत दावे करते हैं और बड़े ही शांत और सुनियोजित ढंग से इसे रोजगार का रूप देते हैं .इन्हें पता होता है की ये झूठ बोल रहें हैं परन्तु रटे -रटाये वाक्य और धार्मिक -आध्यात्मिक कुतर्कों की बदौलत ये अपनी झोलियाँ आराम से भरकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं. जरुरत है मन-मष्तिष्क को पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की ..यह मुश्किल है पर नामुमकिन नही.

ऐसा नहीं है कि कुछ लोगों के पास इछाशक्ति होती है और कुछ के पास नहीं. सच यह है कि कुछ लोग बदलने के लिए तैयार रहते हैं और कुछ नहीं.

अपडेट - इस सन्दर्भ में द्विवेदी जी और अरविन्द जी की इन पोस्टों के अवश्य पढ़े पुरजोर सिफारिस है.

जब वैद्य मामा से औरत पर चढ़ने वाला भूत डरने लगा
उसे साँप ने नहीं काटा था..

प्रणय संबंधों में विज्ञान

फ़िर उपस्थित हूँ. आज हम पिछली पोस्ट पर आई टिप्पनिओं और प्रेम के अन्य पहलुओं पर चर्चा करेंगे,पर उससे पहले
एक प्रश्न पूछती हूँ,किसी पर्यवेक्षण के आधार पर निकले गए निष्कर्ष अथवा किसी नियम के सिद्धांत होने की शर्तें क्या है?
मुझे जहाँ तक लगता है-
1. वास्तविक तथ्यों पर आधारित होना
2. उपयोगिता
3. व्यहवारिकता
इस कसौटी पर प्रेम के रासायनिक विवरण को जांचा जाय तब हम पाते हैं,यह वास्तविक तथ्यों पर आधारित है, कुछेक अपवादों को छोड़कर जिनका जिक्र स्वपनदर्शी जी ने अपनी टिप्पणी में किया, आगे हम भी करेंगे. रासायनिक विवरणों और प्रणय अनुभूतियों के संबंध को ऐसे देखा जाये की ऐसा तब होता है, जब हम प्रणय के लिए मानसिक रूप से तैयार होते हैं. तथ्यों के सामान्यीकरण(Generalization) की अपनी शर्तें हैं और वह मेरा विषय नही है.हम दुसरे पॉइंट की तरफ जाते हैं.


हेलन फिसर के अनुसार -प्रणय संबंधों की परिणिति से पुर्व तीन स्टेज होते हैं. हर स्टेज में दिमाग में रसायनों और हार्मोनो की अपनी भूमिका होती है. पहला स्टेज वह होता है जब प्रणय संबंधो के आरम्भ के लिए मानसिक रूप से तैयार होते हैं. जब हम किसी को देखते हैं और सामजिक, दैहिक और मानसिक रूप से उसे उस कल्पना के अनुरूप पाते हैं जो हमारे चेतन अथवा अवचेतन मस्तिष्क में हमारे साथी को लेकर थी.इस दौर में अधिक सक्रीय पाए गए हैं टेस्टोस्टरोंन और आस्ट्रोजन.
दूसरी स्टेज वह होती है जब हम उस मनुष्य के प्रति विशेष आकर्षण महसूस करने लगते हैं. इस दौर में मष्तिष्क के तीन न्यूरोट्रांसमीटरों की सक्रीय भूमिका पाई गई है एड्रेनालिन, डोपामाइन तथा सेरोटोनिन. महत्पूर्ण मानसिक बदलाव होते हैं और वे चेहरे की लालिमा और नसों में रक्त संचार साथी की उपस्थिति के भान से ही बढा देते हैं. यह वह दशा है जब प्रस्तावित प्रेमी/प्रेमिका के नाम से ही आनन्द महसूस होता है. यह आपकी सोंचने समझने की शक्ति पर कब्जा जमा लेता है यहाँ एक शोध का सन्दर्भ देना चाहूंगी, इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिसा में हुए एक शोध के अनुसार २० प्रेमी युगलों(जिनका प्रणय प्रसंग आरभ हुए कुछ महीनो का समय बिता था) के सेरोटोनिन के स्तर की तुलना आब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर के रोगीओं से की गई और आश्चर्यजनक रूप से दोनों में सेरोटोनिन का स्तर बराबर पाया गया. कहा जा सकता है प्रेम आपकी सोंचने समझने की क्षमता पर कब्जा जमा लेता है, आप वही देखते हैं जो आप देखना चाहते हैं. लोगों के सोंचने का तरीका बदलता है और वे प्रेम के तीसरी स्टेज की ओर प्रेषित होते हैं. प्रेम की तीसरी स्टेज है सामीप्य और गहरा अटेचमेंट यह आपको परिपक्वता और स्थाइत्व की ओर ले जाता है. यहाँ तीव्र उतेजना के दौरान रिलीज हुए हारमोन ऑक्सीटॉक्सिन की भूमिका होती है. यही हारमोन माता और बच्चे के बीच प्रेम बढ़ने के लिए भी उतरदाई है. यहाँ एक हारमोन और उल्लेखनीय है जिसे वासोप्रेसिन कहते हैं. यह भी यौन संसर्ग के बाद रिलीज़ होता है( इसे एंटी-यूरिन हारमोन भी कहते हैं). महिलाओं में इस हारमोन की मौजूदगी उन्हें यौन संबंधों की ओर आकर्षित करती है.जोड़े में रहने वाले अमेरिकी मादा पक्षिओ पर परिक्षन के दौरान जब वैज्ञानिकों ने पक्षी को वासोप्रेसिन खत्म करने की दवा दी, उन्होंने अपने साथियों की उपेक्षा करनी शुरू कर दी. यह थे उपयोगिता को लेकर कुछ प्रमाण.
व्यहवारिकता की कसौटी पर वे निष्कर्ष उतने सटीक और प्रमाणिक है या नही यह आप स्वयं परिक्षा कर सकते हैं. यह जानने के लिए आपको कई पक्षों पर ध्यान देना होगा जो उपरोक्त बातों से ज्यादा जटिल है. इस संदर्भ में सार्थक आलेख एक मित्र ने पहले ही लिखा डाला है, अतएव मैं अनावश्यक दोहराव से बचना ही उचित समझती हूँ, निवेदन है की लिंकित लेख पढ़ कर ही कोई धारणा बनायें. सामाजिक आयामों की चर्चा फिर कभी वरना इस पोस्ट को लिखने का मेरा उद्धेश्य प्रभावित होगा. बाकि टिप्पनिओं पर चर्चा अगली बार की जायेगी.

प्रणय संबंध, विज्ञान और कुछ विचार.

मैं इस विषय पर लिखने के लिए बहुत दिनों से सोंच रही थी न मौका मिल पर रहा था न ही कोई ऐसा प्रसंग(व्यस्तता और अनियमितता का रोना अब मेरे लिए भी पुरानी बात हो गई है).
मुझसे पहले मेरे मित्रों का मत देख लें अरविन्द जी , समय जी (यहाँ सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टी वाले मतों पर चर्चा होगी,बाकि मित्रो से क्षमा याचना सहित)
हमारे मित्रों का मानना है की रूहानी प्रेम एक मायाजाल से ज्यादा कुछ नही है. मैं अपना मत स्पस्ट कर दूँ मेरे अनुसार १०० प्रतिशत प्रेम की भावना दिमाग में पनपती है. इस दिशा में रिवर्स गेयर लगया जाय तो मेरी जानकारी में १९७० में मनोवैज्ञानिक हेलन सिंगर कप्लान ने पहली बार वीलह्यूमन सेसुएलिटी प्रोग्राम में इस ओर इशारा किया,वैसे विज्ञान बहुत पहले ही यानि १९२० में ही इस ओर ध्यान देने लगा था.
हम रूहानी प्रेम के अनुभवों पर ध्यान देते हैं.
साइंस ऑफ़ लव की एक्सपर्ट हेलन फिसर के अनुसार (पुस्तक - why we love) रूहानी प्यार दुनिया के सभी हिस्सों में महसूस किया जाता है, और मस्तिष्क के कुछ खास रसायनों पर निर्भर करता है. रूहानी जूनून पैदा करने के लिए दिमाग के डोपामाइन, नोरेपाइन, सेरोटोनिन नामक तीन रसायन जिम्मेवार हैं.
प्यार में भूख न लगाना ,नींद न आना और बेवकूफी की हद पारकर सहासी कार्य कर जाना, का सम्बन्ध डोपामाइन या नोरेपाइन प्राइम्स के उतार चढाव से ही है. अब यक्ष प्रश्न यह है की हम सभी जानते हैं की विवाहित नारी/पुरुष अविवाहितों की अपेक्षा अधिक दिन जीते हैं, लेकिन इसका श्रेय किसे दिया जाय रूहानी रोमांस को या सेक्स को ? यह प्रश्न आपपर छोडा जाता है..मैं कोई निष्कर्ष नही दे रही.
१९९९ में यूनिवर्सिटी आफ ब्रिटिश कोलंबिया के रिसर्चर रोजमैरी बासन ने निष्कर्ष दिया की औरतों में लव पैटर्न एक सा रहता है, पर मर्दों में अलग अलग हो सकता है(यहाँ भी फर्क है :-)). डाक्टर जेनिफर बर्मन के अनुसार जहाँ नारियां साथी की नजदीकियों को प्रेम की दीवानगी का सबब बनाती हैं, वहीँ पुरुष दृश्यों को देखकर और कल्पना करके प्रेम में गहरे उतरते हैं, यहाँ दीवानगी में गहरे डुबोने का काम एक रसायन करता है, जिसे निट्रिक ओक्साइड कहते हैं (ध्यातव्य हो की सेक्स ड्रग वियग्रा भी यही पैदा करता है). यानि कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं, रूहानी प्रेम एक स्टेप बाय स्टेप प्रक्रिया है मनोवांछित लक्ष्य की ओर, कम से कम मैंने जितना पढ़ा अब तक उसके अनुसार यही निष्कर्ष निकाल पाई हूँ, पर यह कहूँगी की याद कीजिये एडगर एलन पो का अपनी बालिका वधु (वह महज १३ साल की थी जबकि एलन २६ साल के) के प्रति प्रेम. इसपर फिर कभी लिखूंगी पर इतना बताती जाती हूँ, रेवन शीर्षक कविता उसने उसकी याद में लिखी यह अंग्रेजी साहित्य की सर्वश्रेष्ट कविताओं में शुमार की जाती है. क्यों उसने फिर कहीं और प्रेम तलास नही किया,क्यों वह उसकी याद में तडपता रहा..? विज्ञान ने अभी सब गुथ्थियाँ नही सुलझाई है ..हम सिर्फ प्रतिक्षा करते हैं.

शिव जी का क्रोध और कैथोलिक यूनिवर्सिटी

आप सब को याद होगा की कुछ दिन पहले ब्लोग-मित्र आशीष जी ने पोस्ट लिखकर आस्ट्रेलियन कैथोलिक यूनिवर्सिटी की साईट में हिंदी ब्लोगों की उपस्थिति पर टिप्पणी की थी ..मैंने देखा वहां बहुत से ब्लॉग थे ..देखकर अनदेखा कर गई ..दो-तीन दिन पहले हमारी शिव जी से चैट पर बात हो रही थी..

शिव: मैंने उस आस्ट्रेलियन यूनिवर्सिटी को शिकायत भेजी थी...उसने मेरा ब्लॉग हटा दिया अपनी साईट से :-)
मैं -: मेरा नहीं हटाया होगा :-(
शिव: मैने तो डरा दिया...मैने कहा मेदिनीपुर मे केस फाइल कर दूँगा...:-)डर गये होंगे बेचारे...
मैं -: हा हा हा.. ज़रा मेल फॉर्वर्ड करिए...आपके जैसी धमकात्मक भाषा और कहाँ, आपको बहुत अच्छा तजुर्बा है इनसे निपटने का :-)
शिव: मैने बता दिया की हमारे देश मे एक बार केस फाइल हो गया तो फिर 50 साल चलता है...:-) मेल फॉर्वर्ड कर दिया है...
मैं -: हाँ मिल गया.. कितनो को धमकी दीजिएगा? पता नहीं इन्हे मोटे मोटे अक्षरो मे लिखा कॉपी प्रोटेक्ट वाला मैसेज काहे नही नज़र आता.
शिव: बेचारे सीटे भरना चाहते हैं...क्या करें और?
मैं -: There was a bug in our system that caused certain pages to open links to external websites within our design... कितने भोले हैं...मासूम हैं....बेचारे!
शिव: भोले बाबा पार कर देता है ना...;-)
मैं -: पता भी है हिन्दी ब्लॉगरों से पाला पड़ा है..यहाँ स्पैम भेजने वालों को कवितायेँ भेजी जाती है
शिव : मैंने तो सोच लिया था की नहीं हटाएगा तो चार -पांच कवितायेँ लिख डालूँगा ..
मैं - यह भी अच्छा होता :-)

आज मैंने देखा की मेरा ब्लॉग भी वहां से हटा हुआ है ..और एक दो हिंदी ब्लॉग के नाम डाले...सर्च किया..नही मिले. लगता है, आस्ट्रेलिया वाले सच में डर गए :-) शिव जी के क्रोध से.

लेटेस्ट अपडेट : अब वहां कोई भी हिंदी ब्लॉग नही दिख रहा ..शायद :-) (आप अपना वाला चेक कर लें )

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दिनों बाद ब्लॉग में कुछ लिखा मैंने ..अच्छा लग रहा है :-)

He who rejects change is the architect of decay. The only human institution which rejects progress is the cemetery.

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