जब हम मानव द्वारा संग्रहित ज्ञान और डार्विन के विकासवाद के सापेक्ष मानव के एतिहासिक क्रमविकास को देखते हैं कई बातें उभरती है. किसी अवधारणा के प्रति दुराग्रह मुक्त एक मानव मस्तिष्क ही इन चीजों का आकलन सार्थक रूप से कर पाता है. यह एक निर्विवाद तथ्य है की मानव सभ्यता का विकास प्रकृति के विरुद्ध और उसके द्वारा निर्मित कई प्रकार के डरों के बीच से गुजरते हुए हुआ है, उदहारण के लिए हिंसक पशु, प्राकृतिक आपदाएं, सिमित साधनों का उपभोग करके जीवित रहने के लिए परस्पर प्रतियोगिता ..कई चीजों थी, जिससे मानव जूझता रहा आदिम से आधुनिक बनने के सफ़र में, देखा जाए तो अब भी ये भय चोला बदल-बदल कर अपनी उपस्थिति जताते रहते हैं.
आरम्भ में मनुष्य जब गुफाओं में रहता था आसमान में आलोकित सूर्य से ही उसे उर्जा मिलती. उर्जा के और साधनों की खोज बहुत बाद में हुई. असमान से आते प्रकाश ने उसे यह सोंचने पर विवश किया होगा की ऊपर अवश्य ही कोई है जो उसे दिन में जंगली जानवरों और खूंखार निशाचर जीवों और रात्रि में जानलेवा ठंढ से बचाता है. कहा जा सकता है, इसी भय ने पहले किसी मानसिक संरक्षण और भयमुक्ति प्रदान करने वाली शक्ति की आवश्यकता उत्त्पन की और कालांतर में(भाषा के विकास के साथ)उसे ईश्वर की उपमा से विभूषित किया. इसे हम वर्तमान परिदृश्य में भी देख सकते हैं जहाँ उर्जा के कई प्रतीकात्मक रूपों की आधुनिक समाज में ईश्वर का अंश मान के आराधना की जाती है.
मानव का समाजीकरण प्रकृति की जैविक व्यवस्था के विरुद्ध था. अंतर्विरोधों से संघर्ष करते हुए मनुष्य समाजिकता और सभ्यता की सीढियाँ चढ़ता गया, जटिल होता गया...ईश्वर की अवधारण को कई रूपों में (जैसे चित्रों, गीतों, कहावतों, कहानिओं और लिखित दस्तावेजों द्वारा) अगली पीढी को हस्तान्तरित करता गया..और इसके साथ कई पिढि़ओं से संग्रहित भय (जो उसे अपने बनैले पूर्वजों से विरासत मिला था)भी जटिल होता गया. ईश्वर की अवधारण भी देशकाल समाज के अनुसार बदलती रही...जो आज आपके सामने कई नवीनतम रूपों में उपस्थित है.
आज के लिए इतना ही .. शेष चर्चा फिर कभी. कोई शंका अथवा प्रश्न हो तो अवश्य पूछे.
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अपडेट - अंशुमाली जी की टिप्पणी के बाद मैंने उन्मुक्त जी के पोस्ट का लिंक लगा दिया है, जिसे विकासवाद में रूचि हो वहां पढ़/सुन सकता है.




